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आखिर क्या थी सितारा देवी की भारत रत्न की मांग बोली इससे कम बिल्कुल भी नहीं


भारत में एक से बढ़कर एक कला प्रेमी है, जो अपने कला से न सिर्फ खुद का नाम रोशन करते हैं, बल्कि विश्व पटल पर भारत का नाम भी ऊंचा करते हैं। इसी कड़ी में 99 साल की सितारा देवी का नाम सामने आता है, जो कि एक मशहूर कथक डांसर रह चुकी हैं। जी हां, सितारा देवी भारत की शान मानी जाती है, जिन्होंने महज 16 साल की उम्र में कामयाबी हासिल कर ली थी। इस कामयाबी के बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। ऐसे में आज वे अपना जन्मदिन मना रही हैं, जिसकी वजह से हम आपको उनकी कुछ बाते बताने जा रहे हैं।


8 नवंबर, 1920 में कोलकाता में जन्मी सितारा देवी ने बहुत ही कम उम्र में भी अपार सफलता हासिल कर ली। उन्हें डांसिंग का शौक बचपन से ही रहा, जिसकी वजह से उनका करियर इतना मजबूत बन गया। बता दें कि 16 साल की उम्र में उन्हें ‘नृत्य सम्रागिनी’ का खिताब मिल गया था, जिसके बाद से वे पूरी दुनिया में मशहूर हो गई थी। अपने कथक डांस से वे लोगों को हैरान कर देती थी और लोग उनकी तरफ मोहित हो जाते थे, जिसकी वजह से उन्हें भारत की शान भी कहा जाता है।


रविंद्रनाथ टैगोर से मिला था खिताब



सितारा देवी को ‘नृत्य सम्रागिनी’ का खिताब रविंद्रनाथ टैगोर के हाथों से मिला था, जिसकी वजह से उनकी लोकप्रियता बढ़ गई थी। बता दें कि सितारा देवी के परिवार ने समाज से लड़कर अपनी बेटी को कथक सिखाया, जिसके बाद उनकी बेटी ने पूरी दुनिया में उनका नाम रोशन किया। बता दें कि सितारा देवी के पिता सुखदेव संस्कृत के विद्वान माने जाते हैं, जिसकी वजह से उन्होंने अपनी बेटी को नृत्य सिखाया, लेकिन उस समय लड़कियों का डांस करना अभिशाप माना जाता था।


10 साल की उम्र में देने लगी थी परफॉर्मेंस


बताते चलें कि 10 साल की उम्र में ही सितारा देवी सोलो परफॉर्मेंस देने लगी थी, जिसकी वजह से उनका शुरु में बहुत विरोध हुआ था, लोग उन्हें न जाने किस किस नाम से बुलाने लगे थे। उनके पिता को समाज से बेदखल कर दिया गया था, जिसके बाद उन्होंने कहीं और जाकर अपनी दुनिया बसाई। मतलब साफ है कि सितारा देवी ने अपने शुरुआती दौर में बहुत कुछ झेली और उससे भी ज्यादा उनके माता पिता ने उनके लिए कुर्बानियां दी।


भारत रत्न से कम नहीं लूंगी


सितारा देवी को 1970 में पद्मश्री और 1994 में कालीदास सम्मान मिला था, जिसके बाद उन्हें कई तरह के अवॉर्ड मिले। इस बाद साल 2002 में उन्हें पद्मभूषण सम्मान दिया जाने वाला था, लेकिन उन्होंने उसे लेने से मना कर दिया। उनका कहना था कि वे भारत रत्न से कम कोई अवॉर्ड नहीं लेंगी, 
जिसकी वजह से उन्हें पद्मभूषण को मना कर दिया।

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