Breaking News

भारतीय शासकों में असंतोष के क्या कारण थे पड़े पूरी जानकारी

 अंग्रेजो की राज्य विस्तार की नीति के कारण भारत के अनेक शासकों और जमींदारों में असंतोष व्याप्त हो गया था।लार्ड वेलेजली की सहायक संधि व्यवस्था और लार्ड डलहौजी की हड़प नीति के कारण अनेक राज्यो का अंग्रेजी साम्राज्य में जबरदस्ती विलय कर दिया गया।



अंग्रेजो ने पंजाब,सिक्किम, सतारा,जैतपुर, संभलपुर,झांसी,नागपुर आदि राज्यों को अपने अधीन कर लिया था। सरकार ने अवध, तंजोर,कर्नाटक के नवाबो की राजकीय उपाधियां समाप्त कर राजनीतिक अस्थिरता की स्थिति उत्पन्न कर दी। अन्तिम मुगल सम्राटों के प्रति अंग्रेजो व्यवहार अनादरपुर्ण होता चला गया। इन परिस्थतियों में शासन - परिवारों में घबराहट फैल गयी थी। अंग्रेजो ने जिन राज्यों पर कब्जा किया वहां के सैनिक,कारीगर तथा अन्य व्यवसायों में जुड़े लोग भी प्रभावित हुए। अंग्रेजी ने अनेक सरदारों और जमींदारों से उनकी जमीन छीन ली। इसके कारण भारतीय शासकों में असंतोष व्याप्त हो गया। 


1857 के पूर्व ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विद्रोह अपनी आरंंभिक अवस्था में क्यों असफल रहे ?

Ans: ईस्ट इंडिया कम्पनी ने विजय के माध्यम से , भारतीय प्रदेशों का अनुचित तरीको से कंपनी के साम्राज्य में विलय करके तथा भारतीय जनता शोषण करके भारतीय जनमानस को असंंतोष एवं आक्रोश की भावना से भर दिया था। इसका परिणाम यह हुआ कि 1765 से 1856 तक देश के विभिन्न भागोंं में दर्जनो आंंदोलन हुए । इनमें से कई विद्रोह किसानों और आदिवासियों ने किए थे। पदच्युत शासकों, जमींदारों और सरदारों के नेतृत्व में भी कई विद्रोह हुए। कंपनी की फौज के सिपाहियों ने भी विद्रोह का झंडा ऊंचा किया। अंग्रेजी शासन के विरुद्ध जितने विद्रोह हुए उनका स्वरूप स्थानीय रहा और और उनका दमन हो गया। यद्यपि यह विद्रोह ब्रिटिश शासन के विरुद्ध गंभीर चुनौती उत्पन्न नहीं कर सके। परंतु इससे यह सिद्ध होता है कि 18 सो 57 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के पूर्व ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के विरुद्ध व्यापक संतोष विद्यमान था। 18 सो 57 के संग्राम की पृष्ठभूमि तैयार करने में विद्रोह की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

1857 ई. संग्राम को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम क्यों कहा जाता है?

Ans: भारत में पहला प्रभावशाली आंदोलन अट्ठारह सौ सत्तावन ईसवी की क्रांति थी। यह भारत का पहला स्वतंत्रता आंदोलन था। इस क्रांति ने अंग्रेजों की जड़ों को हिला कर रख दिया। इससे पहले भी वेल्लोर बैरकपुर तथा बुंदेलखंड में विद्रोह हुए जिन को अंग्रेजों ने कुचल दिया, किंतु इन विद्रोह से अट्ठारह सौ सत्तावन ईसवी के क्रांतिकारियों को बड़ी प्रेरणा मिली। वीर सावरकर अशोक मेहता तथा अन्य भारतीय इतिहासकारों ने अट्ठारह सौ सत्तावन ईसवी की क्रांति को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का नाम दिया। इस क्रांति के उठ खड़ा होने का कारण न तो चर्बी के कारतूसों का प्रयोग करना था और ना ही कुछ भारतीय शासकों का व्यक्तिगत स्वार्थ वर्णन जनसाधारण में वह असंतोष की भावना थी जो पिछले 100 वर्षों के अंग्रेजी राज्य के कारण उत्पन्न हो रही थी। इन इतिहासकारों का विचार है कि विस्फोट की सामग्री काफी समय पहले से  होती आ रही थी। इसे केवल एक चिंगारी की आवश्यकता थी जो चर्बी वाले कारतूसो उसे मिल गई। इसलिए अट्ठारह सौ सत्तावन ईसवी की इस महान क्रांति को केवल सैनिक विद्रोह कर पहला स्वतंत्रता संग्राम या राष्ट्रीय आंदोलन कहना उचित होगा।

No comments