भगवान् राम ने इन पांच व्यक्तियों को जीवित रहने का क्यों दिया था आदेश, आप भी जानिए
दोस्तों हम आपको बता दें की विभीषण, हनुमान, मैंद, द्विविद और जांबवान – इन पाँचों को श्रीराम ने शरीर रखने का आदेश दिया। और कहा “तुम पाँच तब तक जीवित रहो, जब तक कि प्रलय या कलियुग न आ जाए”।

जब द्वापर समाप्त और कलयुग आरंभ होने वाला था, तब राम ने क़ृष्ण के रूप में अवतार लिया था । इस समय जांबवान, मैंद, तथा द्विविद – इन तीनों ने अलग-अलग कारण से कृष्ण से दुश्मनी की । क़ृष्णावतार के समय अर्थात कलयुग के आने के समय इन तीनों की मृत्यु हो गई।
लेकिन हनुमान और विभीषण कलियुग में भी जीवित हैं और प्रयलकाल तक रहे।
1. विभीषण को धरती पर ही रहने की आज्ञा
सुग्रीव की तरह विभीषण भी राम के अंतिम दर्शन और और उनके ही साथ शरीर त्याग करने की लालसा में कुछ अन्य राक्षसों के साथ अयोध्या आ गए थे। लेकिन राम जी ने उन्हें साथ जाने के लिए अनुमति नहीं दिया। उन्होने विभीषण को भगवान विष्णु की निरंतर आराधना करते हुए अपने राज्य के पालन का आदेश दिया। हाँ उनके साथ आए कुछ राक्षसों ने राम के साथ जल समाधि लिया।
कहा जाता है कि राक्षस राज्य क्षेत्र में वैष्णव मत की प्रधानता कायम रखते हुए विभीषण ने बहुत वर्षों तक राज्य किया। आज भी वे जीवित हैं और प्रलय तक रहेंगे।
2. तीन वानर और जांबवान जी को धरती पर रहने का आदेश
विभीषण के अतिरिक्त तीन वानर और एक रीछ जांबवान को भी राम ने शरीर त्याग करने के अनुमति नहीं दी और धरती पर ही बने रहने का आदेश दिया। ये थे:
3. हनुमानजी
इनके लिए राम जी का आदेश था “तुमने दीर्घ काल तक जीवित रहने का निश्चय किया है। अपनी इस प्रतिज्ञा को व्यर्थ न करो। जब तक संसार में मेरी कथाओं का प्रचार रहे, तब तक तुम भी मेरी आज्ञाओं का पालन करते हुए प्रसन्नतापूर्वक विचरते रहो”।
हनुमानजी ने इस आदेश को स्वीकार किया। कहा जाता है कि आज भी जहाँ कहीं राम कथा होती है, वहाँ किसी-न-किसी रूप में हनुमान जी उपस्थित रहते हैं। विभीषण की तरह ये भी प्रलय तक जीवित रहेंगे।
4. मैंद और द्विविद
ये दोनों भी सुग्रीव के महान योद्धा सेनापति थे। इन्होंने राम-रावण युद्ध में बहुत बहादुरी दिखाया था। ये दोनों राम के परम भक्त थे। लेकिन क़ृष्ण अवतार के समय इन्होंने कृष्ण से शत्रुता की और मारे गए।
5. जांबवान
रीछ राज जांबवान भी राम के बहुत बड़े भक्त थे। लेकिन कृष्ण अवतार के समय अपने आराध्य देव को इस रूप में पहचान नहीं सकें। फलतः कृष्ण-जांबवान में भयंकर द्वन्द्व युद्ध हुआ। इसमें जांबवान जी की हार हुई । वे अपने आराध्य श्री म को पहचान गए। उन्होंने स्यंमन्तक मणि (जिसके लिए युद्ध हुआ था) और अपनी पुत्री जांबवती दोनों कृष्ण को दे दिया। जांबवती कृष्ण की आठ पटरानियों में से एक थी।
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